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राजन.. यह कैसी पहरेदारी !

 

अरुण द्विवेदी

 भोपाल। मंत्रालय -  हर तरफ पसरा सन्नाटा कुत्तों के भौंकने की आवाज तो सन्नाटे को तोड़ रही थी, लेकिन पुलिस के पदचाप और सीटी का कोई स्वर रात के इस अंधेरे में नहीं था। यह सोचते हुए पराक्रमी और न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य हाथ में तलवार लिए अपने कदमों को मंत्रालय  की ओर बढ़ाए हुए थे। वे एक बार फिर मंत्रालय स्थित ताड़वृक्ष के नीचे पहुंचे और ऊपर पेड़ पर लटके बेताल को उतारने का प्रयास करने लगे।
बेताल हंस पड़ा। राजन तू वास्तव में धुन का बड़ा पक्का है, लेकिन तू मुझे श्मशान तक ले जा नहीं पाएगा। मेरी शर्त फिर वही कि तूने मेरे सवालों का जवाब दिया और मैं गायब। फिर तेरे हाथ आने वाला नहीं। विक्रमादित्य ने बेताल को पेड़ से उतारा और चल पड़ा श्मशान की ओर। रेलवे ओवरब्रिज से होते हुए शुभाष नगर  तक ही पहुंचे कि कांधे पर लटके बेताल ने खामोशी तोड़ी और कहा राजन तू न्यायप्रिय है। धुन का पक्का भी है लेकिन अभी श्मशान काफी दूर है। ऐसे में तुम्हारा सफर कट जाए मैं एक घटना के बारे में तुम्हें बताता हूं। राजन मंत्रालय जैसे सुरक्षित स्थान से तू रात 2 बजे मुझे पेड़ पर चढ़कर उतार लाया और किसी पहरेदार को कोई आहट भी नहीं हुई। राजन पिछले दिनों तो गजब हुआ। इस स्थिति का फायदा चोर उठा ले गए। मंत्रालय  में सरकारी फाईलो पर चोरों ने हाथ मार दिया। इस खजाने की सुरक्षा में पूरे मंत्रालय के सुरक्षा गार्ड रहते हैं। राजन, जैसा कि कहते हैं कि चोर की रात कोई नहीं जागता ऐसा ही हुआ। पहरेदार सोए ही नहीं बल्कि बेहोश मिले और फाईले गायब । फाईले चुरा ले गए चोर। राजन बता कि जहां प्रमुख सचिव गृह का कार्यालय हो, प्रदेश  के मुखियाओं  का दफ्तर हो न्यायालय पास हो ऐसे मुख्य स्थान पर चोरी हो जाना क्या कम हैरत की बात नहीं? कुछ देर खामोश रहकर विक्रमादित्य बोले निश्चित ही हैरत की बात है बेताल। जब खेत की बागड़ मवेशियों से रिश्ता बनाने लगती है तब खेत के चट हो जाने का खतरा बढ़ जाता है। इस वारदात में कुछ ऐसा ही दिखाई देता है बेताल। जहां सुरक्षा का पहरा हो वहां प्रहरी अगर ईमानदारी से कर्तव्य का निर्वहन करे तो किसी अन्य का प्रवेश संभव नहीं, लेकिन बदलते दौर में अब किस पर विश्वास किया जाए। बेताल मैंने स्वयं भी देखा रास्ते भर रात में कुत्ते भूंकते रहे। उल्लू जागते रहे। बिल्लियां रास्ते काटती रही लेकिन एक पुलिसकर्मी रात के अंधेरे में सीटी बजाता या सड़क पर डंडा ठोंकता दिखाई नहीं दिया। इसमें सरकारी खजाना क्या मुझे तो पूरा शहर ही असुरक्षित दिखाई दिया बेताल। दरअसल बेताल सबकी अपनी समस्या है। पुलिस भी इंसान है। उसका मन भी आम आदमी की तरह डगमगाता है। कभी पैसों के लिए, कभी शराब के लिए, कभी बच्चों के लिए तो कभी छुट्टी के लिए, कुछ ऐसी आदतें जब ड्यूटी से ज्यादा अहम बनने लगती हैं तब कर्तव्य दोयम हो जाता है। शायद कुछ ऐसी ही स्थितियां अन्य अपराधों की तरह इस वारदात के पीछे कही जा सकती हैं। विक्रमादित्य की बात सुन बेताल खुशी से हंस पड़ा। राजा हो गई न चूक। तूने शर्त तोड़ दी। मैंने कहा था कि तू मेरे सवालों का जवाब देगा और मैं फुर्र हो जाऊंगा। अब तू मुझे नहीं ले जा सकता। यह कह बेताल पुन: मंत्रालय स्थित ताड़  वृक्ष पर जा लटका

 

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